चाँद से बेखबर उसकी, चांदनी से मिल आया हू



चारो तरफ़ अँधेरा, सब कहते अँधेरी रात है
    बात है कुछ और मगर, सब कहते यही बात है  
    राज की एक बात तुम्हे, मै बतलाने आया हू
    चाँद से बेखबर उसकी, चांदनी से मिल आया हू

    लिपट गई थी चांदनी मुझसे, भूल कर बात सब
    इसीलिए तो छाई थी, देखो अँधेरी रात तब
    नासमझ चांदनी की तुम्हे, दास्तान सुनाने आया हू
    चाँद से बेखबर उसकी, चांदनी से मिल आया हू

    कह गई वह बात मुझसे, जिसका कोई मतलब था
    बेवफा चाँद भी है, इसका मुझे तलब था
    चाँद का अँधेरी से रिश्ता, उसको समझाने आया हू
    चाँद से बेखबर उसकी, चांदनी से मिल आया हू

    तुम्हारे ही खातिर चाँद, अँधेरी से मिलने जाता है  
    तुम्हे बेहतर बनाने मे, वह पन्द्रह दिवस लगाता है
   तुम ही हो मोहब्बत चाँद की, यह बतलाने आया हू
    चाँद से बेखबर उसकी, चांदनी से मिल आया हू

    मेरी बातो का असर, चांदनी पर नजर आया है 
    इसीलिए तो देखो फिर, चाँद निखर आया है 
    भूल गम अपने मै, चांदनी मे रंगजाने आया हू  
    चाँद से बेखबर उसकी, चांदनी से मिल आया हू

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वो छोड़ गए तनहा हमको..


नजरो में अपनी हमने ,  एक तस्वीर बसाई थी जिनकी
वो छोड़ गए तनहा हमको, यह प्रीत लगाई थी जिनकी

राहो में खुशबू थी बिखरी, जहा जहा से गुजरे थे वो
अब तो बस यादे है उनकी, यह राह बनाई थी जिनकी

थे कभी रौशन गुलिस्ताँ, आज है बिरानी का आलम
उनसे अब रूठा गुलशन, यह गुलज़ार लगाई थी जिनकी

कभी सपनो की बस्ती में , था अरमानो का महल हमारा   
जल गए अरमां सब उनमे, यह आग लगाई थी जिनकी

उठती थी इस दिल में भी, उमंगो की कुछ ऊंची लहरे
अब तो बस टूटे धड़कन, कभी दिल में बसाई थी जिनकी

देख यू ही किस्मत को अपनी, हम भी थे कुछ इतरा जाते
अब नही मिटती लकीरे, कभी हाथो से मिलाई थी जिनकी

थे बसे नस नस में मेरे, अब तो  निकले बस जान है
ले गए वो साँस हमारी, कभी अपनी बनाई थी जिनकी

देखा था हमने कभी, जख्मो को यू बनते नासूर
अब तो उनमे ही मरहम है, यह चोट लगाई थी जिनकी

कर गुजरा था कुछ भी मै, बिन समझे उनके इशारे
अब तो लटका हू उसमे, यह सलीब बनाई थी जिनकी

नजरो में अपनी हमने, एक तस्वीर बसाई थी जिनकी
वो छोड़ गए तनहा हमको, यह प्रीत लगाई थी जिनकी

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कुछ भी हो नाम मेरा, मै जोकर ही कहलाता हू..


अपनी यह कहानी तुमको , कैसे मै सुनाऊ यारो
अश्को के इस दरिया में, मोती कैसे दिखाऊ प्यारो
गम है हजार दिल में पर , मै मुस्कुराता रहता हू
रूठा है रुब मुझसे मेरा, और मै मनाता रहता हू
                                 ***
सोचता हू मै भी कभी , अपना एक घर बसाऊंगा
मेरी तो कीमत ही क्या है, मै क्या ख्वाब सजाऊंगा
रोता हू दिल ही दिल में मै , पर कहता रहता हू
तुम हंसो, सबको हंसाओ, मै भी तो हँसता रहता हू
                                   ***
हंसती है किस्मत मेरी, कहकर मुझे जोकर यहाँ
जीता हू मर-मर के मै , खाकर रोज ठोकर यहाँ
देकर भी सुबकुछ अपना मै, कुछ नहीं पाता हू
कुछ भी हो नाम मेरा, मै जोकर ही कहलाता हू

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